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Sunday, November 23, 2025

श्री राम स्तुति (Shri Ram Stuti)

 

श्री रामचंद्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं

नवकंज लोचन, कंजमुख कर, कंज पद कंजारुणं ||श्री राम||

 

कंदर्प अगणित अमित छवि नव नील नीरज सुन्दरम

पट पीत मानहु तडित रूचि-सुचि नौमी, जनक सुतावरं ||श्री राम||

 

भजु दीनबंधु दिनेश दानव दैत्य वंश निकन्दनं

रघुनंद आनंद कंद कौशल चन्द्र दशरथ नंदनम ||श्री राम||

 

सिर मुकुट कुंडल तिलक चारू उदारु अंग बिभूषणं

आजानुभुज शर चाप-धर, संग्राम-जित-खर दूषणं ||श्री राम||

 

इति वदति तुलसीदास, शंकर शेष मुनि-मन-रंजनं

मम ह्रदय कंज निवास कुरु, कामादि खल-दल-गंजनं ||श्री राम||


Credit: Bhakti Dhara


Tuesday, November 18, 2025

सीता राम सीता राम सीताराम कहिये

 सीता राम सीता राम सीताराम कहिये

सीता राम सीता राम सीताराम कहिये

जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये

जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये

सीता राम सीता राम सीताराम कहिये

जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये


मुख में हो राम नाम राम सेवा हाथ में

मुख में हो राम नाम राम सेवा हाथ में

नहिं तू अकेला प्यारे राम तेरे साथ में

विधि का विधान जान

विधि का विधान जान हानि लाभ सहिये

जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये

सीता राम सीता राम सीताराम कहिये

जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये


किया अभिमान तो फिर मान नहीं पायेगा

किया अभिमान तो फिर मान नहीं पायेगा

होगा प्यारे वही जो श्री रामजी को भायेगा

फल आशा त्याग शुभ काम करते रहिये

जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये

सीता राम सीता राम सीताराम कहिये

जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये


ज़िन्दगी की डोर सौंप हाथ दीनानाथ के

ज़िन्दगी की डोर सौंप हाथ दीनानाथ के

महलों मे राखे चाहे झोंपड़ी मे वास दे

धन्यवाद निर्विवाद

धन्यवाद निर्विवाद राम राम कहिये

जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये

सीता राम सीता राम सीताराम कहिये

जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये


आशा एक रामजी से दूजी आशा छोड़ दे

आशा एक रामजी से दूजी आशा छोड़ दे

नाता एक रामजी से दूजा नाते तोड़ दे

साधु संग राम रंग अंग अंग रंगिये

जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये

सीता राम सीता राम सीताराम कहिये

जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये


Thursday, November 13, 2025

एकश्लोकी रामायण(Ek Shaloki Ramayan)

 




आदौ राम तपोवनादि गमनं, हत्वा मृगं कांचनम् ।

वैदेहीहरणं जटायुमरणं, सुग्रीवसंभाषणम् ।।

बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं, लंकापुरीदाहनम् ।

पश्चाद् रावण कुम्भकर्ण हननम्, एतद्धि रामायणम् ।।